हाँ, मैं इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ। अत्याचार को चुपचाप सहने से अत्याचारी का मनोबल और अधिक बढ़ जाता है। न्याय और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए प्रतिकार करना हर जीवित प्राणी का नैतिक धर्म है।
“बैलों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी”, “अत्याचार सहना भी अन्याय में भागीदारी है”- क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के कारण भी बताइए।
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पूरी तरह सेहमत हू की अत्याचार सहना भी पाप की भागीदारी है
यदि हीरा और मोती गया के डंडे चुपचाप सहते रहते, तो वह उन पर और अधिक क्रूरता करता। जब मोती ने हल लेकर भागने और बाद में विद्रोह करने का निश्चय किया, तभी गया को उनकी शक्ति का अहसास हुआ। समाज में भी जब लोग अन्याय के विरुद्ध आवाज नहीं उठाते, तो व्यवस्था और अधिक भ्रष्ट हो जाती है। चुप रहना अत्याचारी को मौन स्वीकृति देने जैसा है। इसलिए, अपनी सुरक्षा और गरिमा के लिए संघर्ष करना अनिवार्य है। हीरा-मोती का विद्रोह यह सिखाता है कि दासता की बेड़ियाँ तभी टूटती हैं जब सहने की शक्ति साहस में बदल जाती है।
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