1. लेखक का मानना है कि समाज कभी भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं हो सकता। विकास की प्रक्रिया में पुरानी परंपराएं समय के साथ अप्रासंगिक हो जाती हैं और नए सामाजिक दोष जन्म ले लेते हैं। जो विचार कल तक 'सुधार' माने जाते थे, वे आज की परिस्थितियों में 'दोष' बन सकते हैं। इसलिए, समाज को बेहतर बनाने की प्रक्रिया कभी रुRead more

    लेखक का मानना है कि समाज कभी भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं हो सकता। विकास की प्रक्रिया में पुरानी परंपराएं समय के साथ अप्रासंगिक हो जाती हैं और नए सामाजिक दोष जन्म ले लेते हैं। जो विचार कल तक ‘सुधार’ माने जाते थे, वे आज की परिस्थितियों में ‘दोष’ बन सकते हैं। इसलिए, समाज को बेहतर बनाने की प्रक्रिया कभी रुकती नहीं है। हर नई पीढ़ी अपने समय की समस्याओं को देखती है और उन्हें सुधारने का प्रयास करती है। इसीलिए लेखक कहते हैं कि सुधारों का कोई अंत नहीं है; यह एक निरंतर चलने वाला चक्र है जहाँ वर्तमान हमेशा खुद को सुधारने और नए आदर्श स्थापित करने में व्यस्त रहता है।

     

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    एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 क्या लिखूँ? समाधान – प्रश्न उत्तर, कठिन शब्द-उत्तर, सारांश तथा अभ्यास के सभी प्रश्नों के हल – सत्र 2026-27 के अनुसार संशोधित रूप में यहाँ दिए गए हैं।

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  2. लेखक के अनुसार, 'दूर के ढोल सुहावने' केवल एक कहावत नहीं बल्कि मानव मन की एक गहरी प्रवृत्ति है। जब हम किसी वस्तु के निकट होते हैं, तो उसकी कमियां और कर्कशता हमें परेशान करती है, जैसे ढोल के पास बैठे व्यक्ति को उसका शोर सुनाई देता है। लेकिन दूर बैठे व्यक्ति को केवल उसकी गूँज और मधुरता का अनुभव होता हैRead more

    लेखक के अनुसार, ‘दूर के ढोल सुहावने’ केवल एक कहावत नहीं बल्कि मानव मन की एक गहरी प्रवृत्ति है। जब हम किसी वस्तु के निकट होते हैं, तो उसकी कमियां और कर्कशता हमें परेशान करती है, जैसे ढोल के पास बैठे व्यक्ति को उसका शोर सुनाई देता है। लेकिन दूर बैठे व्यक्ति को केवल उसकी गूँज और मधुरता का अनुभव होता है। इसी तरह, हम अपने वर्तमान की समस्याओं से इतने घिरे होते हैं कि हमें अपना अतीत या भविष्य अधिक सुखद लगता है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि दूरी दोषों को छिपा देती है और केवल सुंदरता को उभारती है, जिससे मनुष्य हमेशा उस सुख की कामना करता है जो उसके पास वर्तमान में उपलब्ध नहीं है।

     

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  3. सही उत्तर: (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना निबंधकार यह तर्क देते हैं कि निबंध लेखन के लिए कोई विशेष विषय अनिवार्य नहीं है। जिस प्रकार हैट टाँगने के लिए खूँटी मात्र एक साधन है, उसी प्रकार विषय केवल आधार है। वास्तविक महत्व लेखक की मानसिक स्थिति, उमंग और उसके हृदय की स्फूर्ति का हRead more

    सही उत्तर: (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना

    निबंधकार यह तर्क देते हैं कि निबंध लेखन के लिए कोई विशेष विषय अनिवार्य नहीं है। जिस प्रकार हैट टाँगने के लिए खूँटी मात्र एक साधन है, उसी प्रकार विषय केवल आधार है। वास्तविक महत्व लेखक की मानसिक स्थिति, उमंग और उसके हृदय की स्फूर्ति का होता है। लेखक अपने मनोभावों और आवेग को किसी भी विषय में भर देता है, जिससे वह विषय प्रभावी बन जाता है। अतः विषय की तुलना में लेखक के भावों की प्रधानता सर्वोपरि होती है।

     

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  4. सही उत्तर: (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना निबंध की मानटेन पद्धति लेखक को शास्त्रीय बंधनों और जटिल नियमों से मुक्त करती है। इसमें लेखक जो कुछ देखता, सुनता और अनुभव करता है, उसे बिना किसी बनावट के लिपिबद्ध कर देता है। ऐसे निबंधों में न तो कल्पना की उड़ान होती है और न ही गंभीर तार्किक विश्लेषणRead more

    सही उत्तर: (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना

    निबंध की मानटेन पद्धति लेखक को शास्त्रीय बंधनों और जटिल नियमों से मुक्त करती है। इसमें लेखक जो कुछ देखता, सुनता और अनुभव करता है, उसे बिना किसी बनावट के लिपिबद्ध कर देता है। ऐसे निबंधों में न तो कल्पना की उड़ान होती है और न ही गंभीर तार्किक विश्लेषण, बल्कि उनमें लेखक के सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति और उसका उल्लास झलकता है। यह पद्धति अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाने का सशक्त आधार प्रदान करती है।

     

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  5. कक्षा 9 के लिए हिंदी गंगा (नया एनसीईआरटी 2026-27) दूसरा अध्याय - 'क्या लिखूँ?' निबंध में लेखक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने निबंध लेखन की कला का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। लेखक दो अलग-अलग विषयों, 'दूर के ढोल सुहावने' और 'समाज-सुधार' के माध्यम से बताते हैं कि एक निबंधकार के लिए विषय का महत्व गौण होता है,Read more

    कक्षा 9 के लिए हिंदी गंगा (नया एनसीईआरटी 2026-27) दूसरा अध्याय – ‘क्या लिखूँ?’ निबंध में लेखक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने निबंध लेखन की कला का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। लेखक दो अलग-अलग विषयों, ‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’ के माध्यम से बताते हैं कि एक निबंधकार के लिए विषय का महत्व गौण होता है, जबकि उसके अपने मौलिक विचारों और आंतरिक उल्लास की प्रधानता सर्वोपरि होती है। वे आधुनिक और प्राचीन दृष्टिकोणों की तुलना करते हुए स्पष्ट करते हैं कि तरुण भविष्य के सपने देखते हैं और वृद्ध अतीत का गौरव गान करते हैं। अंततः, निबंध वही श्रेष्ठ है जिसमें लेखक के अनुभवों की सजीवता और शैली की सरलता का सुंदर समन्वय दिखाई दे।

     

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