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“शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति” वाक्य में वर्णन है— (क) बलखाती लहरों का (ख) सागर की व्यापकता का (ग) सूर्यास्त के दृश्य का (घ) पच्छिमी क्षितिज का
यह विकल्प सर्वथा उपयुक्त है क्योंकि कन्याकुमारी की आखिरी चट्टान पर खड़े होकर लेखक ने अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के संगम को देखा। तीनों दिशाओं में क्षितिज तक फैला अथाह पानी समुद्र के असीम विस्तार को दिखाता है और उन तूफानी लहरों का लगातार चट्टानों से टकराना उसकी अपार ऊर्जा को प्रकट करताRead more
यह विकल्प सर्वथा उपयुक्त है क्योंकि कन्याकुमारी की आखिरी चट्टान पर खड़े होकर लेखक ने अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के संगम को देखा। तीनों दिशाओं में क्षितिज तक फैला अथाह पानी समुद्र के असीम विस्तार को दिखाता है और उन तूफानी लहरों का लगातार चट्टानों से टकराना उसकी अपार ऊर्जा को प्रकट करता है। लेखक इसी भाव को व्यक्त करते हैं कि समुद्र का यह अंतहीन फैलाव ही उसकी शक्ति है और उस शक्ति का रूप उसका यह विराट विस्तार है।
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See lessलेखक की कन्याकुमारी की यात्रा का वर्णन पढ़कर कहा जा सकता है कि— (क) यह कन्याकुमारी के मौसम को प्रमुखता से वर्णित करता है। (ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है। (ग) यह केवल यात्रा के रोमांच पर केंद्रित है। (घ) इसमें कन्याकुमारी का काल्पनिक वर्णन मिलता है।
यह विकल्प पूरी तरह उपयुक्त है क्योंकि मोहन राकेश का यह यात्रा-वृत्तांत बाह्य दृश्यों के साथ-साथ आंतरिक अनुभूतियों को भी सुंदरता से जोड़ता है। कन्याकुमारी की तूफानी लहरों, ढलते सूर्य के बदलते रंगों और बढ़ती लहरों के बीच सुरक्षित लौटने के भय के साथ-साथ स्थानीय शिक्षित युवाओं की बेकारी जैसी वास्तविकताओRead more
यह विकल्प पूरी तरह उपयुक्त है क्योंकि मोहन राकेश का यह यात्रा-वृत्तांत बाह्य दृश्यों के साथ-साथ आंतरिक अनुभूतियों को भी सुंदरता से जोड़ता है। कन्याकुमारी की तूफानी लहरों, ढलते सूर्य के बदलते रंगों और बढ़ती लहरों के बीच सुरक्षित लौटने के भय के साथ-साथ स्थानीय शिक्षित युवाओं की बेकारी जैसी वास्तविकताओं को लेखक ने इतने सजीव ढंग से उकेरा है कि पाठक स्वयं उस यात्रा का सजीव अनुभव करने लगता है।
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See lessयात्रियों का समूह सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए सैंड हिल की ओर बढ़ता जा रहा था लेकिन लेखक सैंड हिल पर पहुँचकर कुछ देर रुकने के बाद दूसरे टीले की ओर बढ़ने लगा। उसके ऐसा करने के पीछे मूल कारण क्या था?
अधिकांश पर्यटक सैंड हिल पर बैठकर ही सूर्यास्त देख रहे थे, किंतु लेखक प्रकृति के सौंदर्य को किसी आड़ या सीमित दायरे में नहीं देखना चाहते थे। सैंड हिल से सामने का समुद्र तो दिखता था, पर अरब सागर की दिशा में मौजूद एक दूसरा ऊँचा टीला मुख्य क्षितिज को ओट में लिए हुए था। लेखक की प्रबल इच्छा थी कि वे अस्ताRead more
अधिकांश पर्यटक सैंड हिल पर बैठकर ही सूर्यास्त देख रहे थे, किंतु लेखक प्रकृति के सौंदर्य को किसी आड़ या सीमित दायरे में नहीं देखना चाहते थे। सैंड हिल से सामने का समुद्र तो दिखता था, पर अरब सागर की दिशा में मौजूद एक दूसरा ऊँचा टीला मुख्य क्षितिज को ओट में लिए हुए था। लेखक की प्रबल इच्छा थी कि वे अस्ताचलगामी सूर्य को खुले आकाश और सागर के अंतहीन विस्तार की पृष्ठभूमि में देखें, इसलिए वे सैंड हिल से आगे अन्य टीलों की ओर बढ़ गए।
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See lessलेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों के विषय में क्या-क्या बताया?
लेखक ने कन्याकुमारी के जन-जीवन की वास्तविक और संवेदनशील तस्वीर प्रस्तुत की है। वहाँ की लगभग आठ हजार की आबादी में चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक पूरी तरह बेकार थे, जिनमें लगभग सौ स्नातक थे। वे नौकरियों के लिए आवेदन भेजते, सीपियों का गूदा खाते और दार्शनिक विषयों पर बहस करते थे। जीवन-यापन के लिए कोई फोटो-एRead more
लेखक ने कन्याकुमारी के जन-जीवन की वास्तविक और संवेदनशील तस्वीर प्रस्तुत की है। वहाँ की लगभग आठ हजार की आबादी में चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक पूरी तरह बेकार थे, जिनमें लगभग सौ स्नातक थे। वे नौकरियों के लिए आवेदन भेजते, सीपियों का गूदा खाते और दार्शनिक विषयों पर बहस करते थे। जीवन-यापन के लिए कोई फोटो-एल्बम बेचता था, तो स्थानीय युवतियाँ पर्यटकों को शंख व मालाएँ बेचकर परिवार का सहारा बनती थीं। इसके अलावा मल्लाह रबड़ के तनों की नावों से यात्रियों को चट्टान तक ले जाते थे।
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See less“अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया” इस पंक्ति में ‘प्रयत्न की सार्थकता’ से क्या अभिप्राय है?
‘प्रयत्न की सार्थकता’ का अर्थ है कठिन परिश्रम के बाद अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति से मिलने वाला गहरा संतोष। लेखक सूर्यास्त का विस्तृत दृश्य देखने के लिए रेत में पाँव घसीटते हुए एक के बाद एक कई टीले चढ़ते गए। पैर थककर चूर हो चुके थे, किंतु मन हार मानने को तैयार नहीं था। जब वे अंतिम टीले पर पहुँचे और सामRead more
‘प्रयत्न की सार्थकता’ का अर्थ है कठिन परिश्रम के बाद अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति से मिलने वाला गहरा संतोष। लेखक सूर्यास्त का विस्तृत दृश्य देखने के लिए रेत में पाँव घसीटते हुए एक के बाद एक कई टीले चढ़ते गए। पैर थककर चूर हो चुके थे, किंतु मन हार मानने को तैयार नहीं था। जब वे अंतिम टीले पर पहुँचे और सामने रेत की ढलान तथा सागर का अबाध क्षितिज दिखाई दिया, तो उन्हें लगा कि उनका हर कदम और संघर्ष सफल हो गया है।
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