जैविक खाद बनाना ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ वाली बात है। इसमें हम रसोई के कचरे से मूल्यवान खाद बनाकर दोहरा लाभ उठाते हैं। इससे प्रदूषण भी कम होता है और पौधों को पोषण भी मिलता है।
‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ एक लोकोक्ति है। लोक में प्रचलित लोकप्रिय वाक्य या वाक्यांश को लोकोक्ति कहते हैं, जो किसी विशेष अर्थ या सीख को व्यक्त करता है। लोकोक्ति भाषा को समृद्ध करती है तथा विचारों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में सहायता करती है। यह लोगों के अनुभव, विश्वास और मूल्यों को दर्शाती है। आपने यह लोकोक्ति भी सुनी होगी- ‘आम के आम गुठलियों के दाम’। अब आप इस लोकोक्ति और ‘जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास’ विषय को मिलाकर एक संक्षिप्त लेख तैयार कीजिए।
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‘आम के आम गुठलियों के दाम’ लोकोक्ति का अर्थ है दोहरा लाभ प्राप्त करना। जब हम अपने घर के बगीचे या विद्यालय में ‘जैविक खाद’ बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। सामान्यतः हम फल-सब्जियों के छिलकों और सूखे पत्तों को कचरा समझकर फेंक देते हैं, लेकिन जब हम इनका उपयोग खाद बनाने में करते हैं, तो हम कचरे का सदुपयोग कर उसे अनमोल संसाधन में बदल देते हैं।
इससे एक ओर तो पर्यावरण की स्वच्छता बनी रहती है और दूसरी ओर हमें रसायनों से मुक्त, शुद्ध जैविक खाद प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया में हमारा कोई अतिरिक्त व्यय नहीं होता, बल्कि घर के व्यर्थ सामान से ही पौधों के लिए ‘काला सोना’ तैयार हो जाता है। अतः कचरे का प्रबंधन और खाद की प्राप्ति वास्तव में दोहरा लाभ देने वाला एक सराहनीय प्रयास है।
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