1. 'आम के आम गुठलियों के दाम' लोकोक्ति का अर्थ है दोहरा लाभ प्राप्त करना। जब हम अपने घर के बगीचे या विद्यालय में 'जैविक खाद' बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। सामान्यतः हम फल-सब्जियों के छिलकों और सूखे पत्तों को कचरा समझकर फेंक देते हैं, लेकिन जब हम इनका उपयोग खाद बनाने में कRead more

    ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ लोकोक्ति का अर्थ है दोहरा लाभ प्राप्त करना। जब हम अपने घर के बगीचे या विद्यालय में ‘जैविक खाद’ बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। सामान्यतः हम फल-सब्जियों के छिलकों और सूखे पत्तों को कचरा समझकर फेंक देते हैं, लेकिन जब हम इनका उपयोग खाद बनाने में करते हैं, तो हम कचरे का सदुपयोग कर उसे अनमोल संसाधन में बदल देते हैं।

    इससे एक ओर तो पर्यावरण की स्वच्छता बनी रहती है और दूसरी ओर हमें रसायनों से मुक्त, शुद्ध जैविक खाद प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया में हमारा कोई अतिरिक्त व्यय नहीं होता, बल्कि घर के व्यर्थ सामान से ही पौधों के लिए ‘काला सोना’ तैयार हो जाता है। अतः कचरे का प्रबंधन और खाद की प्राप्ति वास्तव में दोहरा लाभ देने वाला एक सराहनीय प्रयास है।

     

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    एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 क्या लिखूँ? समाधान – प्रश्न उत्तर, कठिन शब्द-उत्तर, सारांश तथा अभ्यास के सभी प्रश्नों के हल – सत्र 2026-27 के अनुसार संशोधित रूप में यहाँ दिए गए हैं।

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  2. प्रिय डायरी, आज मुझे 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' वाली बात का विपरीत अनुभव हुआ। पहले मुझे लगता था कि हमारे शहर का नया बड़ा अस्पताल केवल एक सुंदर इमारत है जहाँ बहुत भीड़ और शोर होगा। बाहर से उसकी भव्यता और कांच की दीवारें मुझे बहुत ठंडी और औपचारिक लगती थीं। मेरा अनुमान था कि वहाँ के डॉक्टर और कर्मचारRead more

    प्रिय डायरी, आज मुझे ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ वाली बात का विपरीत अनुभव हुआ। पहले मुझे लगता था कि हमारे शहर का नया बड़ा अस्पताल केवल एक सुंदर इमारत है जहाँ बहुत भीड़ और शोर होगा। बाहर से उसकी भव्यता और कांच की दीवारें मुझे बहुत ठंडी और औपचारिक लगती थीं। मेरा अनुमान था कि वहाँ के डॉक्टर और कर्मचारी भी मशीन की तरह रूखे होंगे।

    परंतु, जब पिछले सप्ताह मुझे अपनी छोटी बहन के इलाज के लिए वहाँ जाना पड़ा, तो मेरा अनुभव बिल्कुल बदल गया। निकट से देखने पर पाया कि वहाँ की व्यवस्था अत्यंत मानवीय और प्रेमपूर्ण थी। डॉक्टरों का व्यवहार और नर्सों की आत्मीयता ने मुझे सुरक्षा का अहसास कराया। वह स्थान केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि सेवा और करुणा का केंद्र था। वास्तव में, बिना निकट जाए हम किसी भी सत्य को पूर्णतः नहीं समझ सकते।

     

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  3. लेखक ने निबंध लेखन की दो धाराओं के बीच के अंतर को बहुत बारीकी से समझाया है। एक ओर निबंधशास्त्र के आचार्य हैं जो मानते हैं कि एक अच्छे निबंध के लिए विषय का गहन ज्ञान, सामग्री का क्रमबद्ध संकलन और प्रभावशाली भाषा अनिवार्य है। यह एक शास्त्रीय और अनुशासित तरीका है। दूसरी ओर, मानटेन जैसी शैली है जहाँ नियRead more

    लेखक ने निबंध लेखन की दो धाराओं के बीच के अंतर को बहुत बारीकी से समझाया है। एक ओर निबंधशास्त्र के आचार्य हैं जो मानते हैं कि एक अच्छे निबंध के लिए विषय का गहन ज्ञान, सामग्री का क्रमबद्ध संकलन और प्रभावशाली भाषा अनिवार्य है। यह एक शास्त्रीय और अनुशासित तरीका है। दूसरी ओर, मानटेन जैसी शैली है जहाँ नियम गौण हो जाते हैं और लेखक का अपना व्यक्तित्व प्रधान हो जाता है। लेखक का मानना है कि वास्तविक निबंध वही है जिसमें औपचारिकता के बजाय आत्मिक सुख और मानसिक स्फूर्ति हो। आदर्श निबंध जहाँ मस्तिष्क की कसरत है, वहीं व्यक्तिगत निबंध हृदय का उल्लास है। इन दोनों शैलियों का समन्वय ही निबंध लेखन की असली चुनौती है।

     

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  4. लेखक का मानना है कि समाज कभी भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं हो सकता। विकास की प्रक्रिया में पुरानी परंपराएं समय के साथ अप्रासंगिक हो जाती हैं और नए सामाजिक दोष जन्म ले लेते हैं। जो विचार कल तक 'सुधार' माने जाते थे, वे आज की परिस्थितियों में 'दोष' बन सकते हैं। इसलिए, समाज को बेहतर बनाने की प्रक्रिया कभी रुRead more

    लेखक का मानना है कि समाज कभी भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं हो सकता। विकास की प्रक्रिया में पुरानी परंपराएं समय के साथ अप्रासंगिक हो जाती हैं और नए सामाजिक दोष जन्म ले लेते हैं। जो विचार कल तक ‘सुधार’ माने जाते थे, वे आज की परिस्थितियों में ‘दोष’ बन सकते हैं। इसलिए, समाज को बेहतर बनाने की प्रक्रिया कभी रुकती नहीं है। हर नई पीढ़ी अपने समय की समस्याओं को देखती है और उन्हें सुधारने का प्रयास करती है। इसीलिए लेखक कहते हैं कि सुधारों का कोई अंत नहीं है; यह एक निरंतर चलने वाला चक्र है जहाँ वर्तमान हमेशा खुद को सुधारने और नए आदर्श स्थापित करने में व्यस्त रहता है।

     

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  5. लेखक के अनुसार, 'दूर के ढोल सुहावने' केवल एक कहावत नहीं बल्कि मानव मन की एक गहरी प्रवृत्ति है। जब हम किसी वस्तु के निकट होते हैं, तो उसकी कमियां और कर्कशता हमें परेशान करती है, जैसे ढोल के पास बैठे व्यक्ति को उसका शोर सुनाई देता है। लेकिन दूर बैठे व्यक्ति को केवल उसकी गूँज और मधुरता का अनुभव होता हैRead more

    लेखक के अनुसार, ‘दूर के ढोल सुहावने’ केवल एक कहावत नहीं बल्कि मानव मन की एक गहरी प्रवृत्ति है। जब हम किसी वस्तु के निकट होते हैं, तो उसकी कमियां और कर्कशता हमें परेशान करती है, जैसे ढोल के पास बैठे व्यक्ति को उसका शोर सुनाई देता है। लेकिन दूर बैठे व्यक्ति को केवल उसकी गूँज और मधुरता का अनुभव होता है। इसी तरह, हम अपने वर्तमान की समस्याओं से इतने घिरे होते हैं कि हमें अपना अतीत या भविष्य अधिक सुखद लगता है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि दूरी दोषों को छिपा देती है और केवल सुंदरता को उभारती है, जिससे मनुष्य हमेशा उस सुख की कामना करता है जो उसके पास वर्तमान में उपलब्ध नहीं है।

     

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