Virat
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भारतीय ज्ञान साहित्य में अनेक स्थानों पर नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में संतुलन की बात की गई है। इस विषय पर अपने शिक्षक के साथ मिलकर चर्चा कीजिए।

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भारतीय साहित्य ‘धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष’ के माध्यम से संतुलित जीवन का संदेश देता है। यह सिखाता है कि व्यक्ति को अपने सांसारिक कर्तव्यों को निभाते हुए आत्मिक शांति और नैतिक मूल्यों का त्याग नहीं करना चाहिए।

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  1. भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता समन्वय और संतुलन है। हमारे वेदों, उपनिषदों और गीता में स्पष्ट कहा गया है कि जीवन केवल उपभोग के लिए नहीं, बल्कि साधना के लिए है। ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ का अर्थ है कि अपने कार्यों को कुशलता और नैतिकता के साथ करना ही योग है।

    नैतिकता हमें सही और गलत का बोध कराती है, जिससे समाज में व्यवस्था बनी रहती है। अध्यात्म हमें आंतरिक शांति और धैर्य प्रदान करता है, जो आज के तनावपूर्ण जीवन में अत्यंत आवश्यक है। वहीं, व्यावहारिक ज्ञान हमें संसार में सफलता प्राप्त करने और अपनी आजीविका चलाने में सक्षम बनाता है।

    श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, जो व्यक्ति अति भोग और अति त्याग के बीच ‘मध्यम मार्ग’ अपनाता है, वही सुखी रहता है। जिस प्रकार एक पक्षी को उड़ने के लिए दो पंखों की आवश्यकता होती है, वैसे ही मनुष्य को उन्नति के लिए भौतिक प्रगति (व्यावहारिक) और मानसिक पवित्रता (आध्यात्मिक) दोनों का संतुलन चाहिए। शिक्षक के साथ इस चर्चा का निष्कर्ष यही है कि मूल्यों के बिना सफलता अधूरी है और कर्म के बिना ज्ञान व्यर्थ है।

     

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