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“मैंने अपने पिताजी का नाम, थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया।” ‘नाम आगे बढ़ाने’ का लता जी के लिए क्या अर्थ है? क्या यह सिर्फ प्रसिद्धि पाना है या इससे कोई महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है?
लता जी के लिए 'नाम आगे बढ़ाने' का तात्पर्य मात्र सांसारिक प्रसिद्धि, धन या पुरस्कार बटोरना नहीं है। उनके अनुसार इसके पीछे एक बहुत बड़ा नैतिक और कलात्मक उत्तरदायित्व जुड़ा हुआ है। इसका अर्थ है कि अपने कर्मों से उस सांगीतिक परंपरा और संस्कारों की गरिमा को नई ऊँचाइयाँ देना जो उन्हें विरासत में मिली थींRead more
लता जी के लिए ‘नाम आगे बढ़ाने’ का तात्पर्य मात्र सांसारिक प्रसिद्धि, धन या पुरस्कार बटोरना नहीं है। उनके अनुसार इसके पीछे एक बहुत बड़ा नैतिक और कलात्मक उत्तरदायित्व जुड़ा हुआ है। इसका अर्थ है कि अपने कर्मों से उस सांगीतिक परंपरा और संस्कारों की गरिमा को नई ऊँचाइयाँ देना जो उन्हें विरासत में मिली थीं। उन्होंने जीवन भर अपनी गायकी की शुद्धता, सादगी और मर्यादा को बनाए रखकर यह सिद्ध किया कि सच्ची प्रसिद्धि निरंतर साधना और उत्तरदायित्व के निर्वहन से ही सार्थक होती है।
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See lessकिसी भी कार्य को पूरा करने में सहयोगियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। साक्षात्कार के आधार पर बताइए कि लता जी के अपने सहयोगियों के साथ संबंध कैसे थे?
साक्षात्कार से स्पष्ट होता है कि लता जी अपने सभी सहयोगियों को अपने परिवार का अभिन्न अंग मानती थीं। स्टूडियो में कोरस की लड़कियों के साथ वे बिना किसी भेदभाव के ज़मीन पर बैठकर सुख-दुख साझा करती थीं और अपनी बहन के विवाह में भी उन्हें सादर आमंत्रित किया था। इसी तरह वरिष्ठ संगीतकारों (जैसे नौशाद, अनिल विRead more
साक्षात्कार से स्पष्ट होता है कि लता जी अपने सभी सहयोगियों को अपने परिवार का अभिन्न अंग मानती थीं। स्टूडियो में कोरस की लड़कियों के साथ वे बिना किसी भेदभाव के ज़मीन पर बैठकर सुख-दुख साझा करती थीं और अपनी बहन के विवाह में भी उन्हें सादर आमंत्रित किया था। इसी तरह वरिष्ठ संगीतकारों (जैसे नौशाद, अनिल विश्वास आदि) के प्रति उनके मन में अगाध श्रद्धा थी; वे प्रतिवर्ष दीवाली की सुबह स्वयं उनके घर मिठाई और शुभकामनाएँ लेकर जाती थीं। उनका यह व्यवहार सहयोगियों के प्रति कृतज्ञता और गहरे अपनत्व को दर्शाता है।
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See less“अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।” क्या आप किसी ऐसी स्थिति से गुजरे हैं जब आपको किसी सही बात पर अकेले खड़ा होना पड़ा हो? कब और क्यों?
हाँ, कक्षा में मुझे ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा था। खेल के मैदान में कुछ सहपाठियों द्वारा एक नए और शांत विद्यार्थी पर बिना किसी प्रमाण के सामान चुराने का आरोप लगाया जा रहा था। पूरी कक्षा बहुमत के दबाव में उनका साथ दे रही थी। मैंने स्वयं उस विद्यार्थी को घटना के समय पुस्तकालय में देखा था, इसलिए मैंRead more
हाँ, कक्षा में मुझे ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा था। खेल के मैदान में कुछ सहपाठियों द्वारा एक नए और शांत विद्यार्थी पर बिना किसी प्रमाण के सामान चुराने का आरोप लगाया जा रहा था। पूरी कक्षा बहुमत के दबाव में उनका साथ दे रही थी। मैंने स्वयं उस विद्यार्थी को घटना के समय पुस्तकालय में देखा था, इसलिए मैंने अकेले खड़े होकर उसका पक्ष लिया। शिक्षकों के समक्ष सच्चाई प्रस्तुत करके मैंने उस निर्दोष सहपाठी को अपमानित होने से बचाया।
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See less“बाबा ने जैसा सिखाया था, उस पर हम सभी भाई-बहनों ने चलने का प्रयास किया।” आपके परिवार में भी कोई ऐसी सीख या नियम अवश्य होंगे जिनका पालन आप किसी के याद दिलाए बिना स्वतः करते होंगे, उनके विषय में बताइए।
हमारे परिवार में माता-पिता द्वारा दिए गए कुछ गहरे नैतिक संस्कार हैं जो हमारी दिनचर्या का स्वाभाविक अंग बन चुके हैं। इनमें प्रातःकाल उठकर बड़े-बुजुर्गों का आदरपूर्वक अभिवादन करना, घर में आए किसी भी अतिथि का मुस्कुराकर सत्कार करना तथा भोजन की बर्बादी न करना प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त, चाहे परिस्थिति कैRead more
हमारे परिवार में माता-पिता द्वारा दिए गए कुछ गहरे नैतिक संस्कार हैं जो हमारी दिनचर्या का स्वाभाविक अंग बन चुके हैं। इनमें प्रातःकाल उठकर बड़े-बुजुर्गों का आदरपूर्वक अभिवादन करना, घर में आए किसी भी अतिथि का मुस्कुराकर सत्कार करना तथा भोजन की बर्बादी न करना प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, सत्य का साथ न छोड़ना और अपनी भूल को स्वीकार करना ऐसा नियम है जिसका पालन हम सभी भाई-बहन बिना किसी के टोके स्वतः करते हैं।
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See less“पहले दिन गुड़ि बाँधने के बाद नौ दिन तक उत्सव मनाया जाता है।” आप भी अपने घर में किसी पारंपरिक पर्व को विशेष तरीके से मनाते होंगे। उसका वर्णन कीजिए।
हमारे परिवार में छठ पूजा और दीपावली का पर्व अत्यंत श्रद्धा व पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। दीपावली पर घर की सामूहिक सफाई के बाद प्राकृतिक रंगों और फूलों से रंगोली बनाई जाती है। शाम को मिट्टी के पारंपरिक दीयों में तेल भरकर पूरे घर और मुंडेरों पर सजाया जाता है। पूजा के पश्चात घर के सभी सRead more
हमारे परिवार में छठ पूजा और दीपावली का पर्व अत्यंत श्रद्धा व पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। दीपावली पर घर की सामूहिक सफाई के बाद प्राकृतिक रंगों और फूलों से रंगोली बनाई जाती है। शाम को मिट्टी के पारंपरिक दीयों में तेल भरकर पूरे घर और मुंडेरों पर सजाया जाता है। पूजा के पश्चात घर के सभी सदस्य एक साथ बैठकर घर में बने पारंपरिक मिष्ठान्न ग्रहण करते हैं तथा पटाखों के स्थान पर दीपों की रोशनी से उत्सव की पवित्रता बनाए रखते हैं।
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