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कोरस में साथ गाने वाली लड़कियों के साथ लता जी के संबंध कैसे थे? (क) औपचारिक (ख) कामकाजी (ग) आत्मीय (घ) प्रतिस्पर्धात्मक
यह विकल्प पूरी तरह उपयुक्त है क्योंकि साक्षात्कार में लता जी ने स्पष्ट बताया है कि कोरस की लड़कियाँ उनके लिए बिल्कुल घर के सदस्यों जैसी थीं। स्टूडियो में जब बैठने के लिए कुर्सियाँ नहीं होती थीं, तब लता जी स्वयं ज़मीन पर बैठकर उनके साथ आत्मीयता से बातचीत करती थीं। बहन मीना के विवाह में भी कोरस के सभीRead more
यह विकल्प पूरी तरह उपयुक्त है क्योंकि साक्षात्कार में लता जी ने स्पष्ट बताया है कि कोरस की लड़कियाँ उनके लिए बिल्कुल घर के सदस्यों जैसी थीं। स्टूडियो में जब बैठने के लिए कुर्सियाँ नहीं होती थीं, तब लता जी स्वयं ज़मीन पर बैठकर उनके साथ आत्मीयता से बातचीत करती थीं। बहन मीना के विवाह में भी कोरस के सभी साथी शामिल हुए और उन्होंने मिलकर उत्सव मनाया, जो उनके बीच के गहरे पारिवारिक और भावनात्मक जुड़ाव को सिद्ध करता है।
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See lessलता मंगेशकर के अनुसार बाबा हरिदास और तानसेन की कथाओं से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है? (क) संगीत द्वारा दीपक जलाए जा सकते हैं। (ख) मेघराग गाने से वर्षा होने लगती है। (ग) सुर में वाद्य बजाने से तार टूट जाते हैं। (घ) संगीत में अपरिमित शक्ति होती है।
यह विकल्प सर्वथा सटीक है क्योंकि लता जी ने स्पष्ट किया है कि दीपक जलने या वर्षा होने जैसी कथाओं को भले ही प्रत्यक्ष न देखा गया हो, किंतु संगीत की अनंत और अप्रत्याशित शक्ति से इंकार नहीं किया जा सकता। उस्ताद अली अकबर खाँ के सरोद का तार सुर की तन्मयता में टूटने की घटना का उल्लेख करते हुए वे कहती हैं कRead more
यह विकल्प सर्वथा सटीक है क्योंकि लता जी ने स्पष्ट किया है कि दीपक जलने या वर्षा होने जैसी कथाओं को भले ही प्रत्यक्ष न देखा गया हो, किंतु संगीत की अनंत और अप्रत्याशित शक्ति से इंकार नहीं किया जा सकता। उस्ताद अली अकबर खाँ के सरोद का तार सुर की तन्मयता में टूटने की घटना का उल्लेख करते हुए वे कहती हैं कि जब कोई कलाकार अपनी पूरी आत्मा को सुर में झोंक देता है, तब संगीत की असीम शक्ति आश्चर्यजनक चमत्कार रचने में सक्षम होती है।
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See lessपूरे साक्षात्कार में लता मंगेशकर की जो छवि बनती है, वह मुख्यतः कैसी है? (क) सादगी, समर्पण और आत्मसम्मान की (ख) प्रसिद्धि, परिवार को समर्पित और आत्ममुग्ध (ग) कठोर सिद्धांतवादी और व्यावहारिक व्यक्ति (घ) आधुनिकता विरोधी रूढ़िवादी विचारों वाली
संपूर्ण साक्षात्कार में लता जी का एक अत्यंत गरिमामयी, विनम्र और प्रेरक रूप उभरकर सामने आता है। विश्वव्यापी प्रसिद्धि मिलने के बाद भी उनका पहनावा और रहन-सहन पूरी तरह सादगी से भरा रहा। उन्होंने कठिन समय में बिना किसी के आगे हाथ फैलाए स्वाभिमान से जीना चुना और जीवनपर्यंत संगीत-साधना व परिवार के प्रति नRead more
संपूर्ण साक्षात्कार में लता जी का एक अत्यंत गरिमामयी, विनम्र और प्रेरक रूप उभरकर सामने आता है। विश्वव्यापी प्रसिद्धि मिलने के बाद भी उनका पहनावा और रहन-सहन पूरी तरह सादगी से भरा रहा। उन्होंने कठिन समय में बिना किसी के आगे हाथ फैलाए स्वाभिमान से जीना चुना और जीवनपर्यंत संगीत-साधना व परिवार के प्रति निष्ठावान रहीं। अपार यश प्राप्त करने पर भी उनमें तनिक अहंकार नहीं था, बल्कि वे इसे ईश्वर और प्रशंसकों का प्रेम मानती थीं।
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See less“पिताजी उस समय पूछते थे, ‘समझ गए न?’… इसके बाद वे कहते थे कि ‘अच्छा अब जाओ, बाहर जाकर खेलो।’” यह प्रसंग पारिवारिक अनुशासन और स्नेह के संतुलन का प्रतीक है। कैसे? (संकेत— यहाँ अनुशासन में डर है या सम्मान?)
यह प्रसंग पारिवारिक अनुशासन और वात्सल्य के सुंदर समन्वय को दर्शाता है। पंडित दीनानाथ जी बच्चों की शरारतों पर चिल्लाने या शारीरिक दंड देने के स्थान पर केवल शांत और गंभीर दृष्टि से उन्हें देखते थे, जिससे बच्चे अपनी भूल स्वतः समझ जाते थे। गलती का बोध होते ही उन्हें तुरंत बाहर खेलने भेज देना पिता के कोमRead more
यह प्रसंग पारिवारिक अनुशासन और वात्सल्य के सुंदर समन्वय को दर्शाता है। पंडित दीनानाथ जी बच्चों की शरारतों पर चिल्लाने या शारीरिक दंड देने के स्थान पर केवल शांत और गंभीर दृष्टि से उन्हें देखते थे, जिससे बच्चे अपनी भूल स्वतः समझ जाते थे। गलती का बोध होते ही उन्हें तुरंत बाहर खेलने भेज देना पिता के कोमल स्नेह को प्रकट करता है। स्पष्ट है कि यहाँ अनुशासन किसी भय या आतंक से नहीं, बल्कि पिता के प्रति मन में बसे गहरे सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव से संचालित होता था।
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See lessलता मंगेशकर पर अपने पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर के व्यक्तित्व का क्या प्रभाव पड़ा? उनके कौन-कौन से कार्यों और व्यवहार में उनके पिता का प्रभाव दिखाई देता है?
लता जी के संपूर्ण जीवन और कार्यशैली पर उनके पिता के व्यक्तित्व की गहरी छाप दिखाई देती है। पिता से उन्होंने मात्र पाँच वर्ष की आयु में शास्त्रीय संगीत का कड़ा अभ्यास और समर्पण सीखा। इसके साथ ही हर परिस्थिति में स्वाभिमान बनाए रखना, सही बात पर दृढ़ रहना और अनुचित समझौते न करने की सीख भी उन्हें पिता सेRead more
लता जी के संपूर्ण जीवन और कार्यशैली पर उनके पिता के व्यक्तित्व की गहरी छाप दिखाई देती है। पिता से उन्होंने मात्र पाँच वर्ष की आयु में शास्त्रीय संगीत का कड़ा अभ्यास और समर्पण सीखा। इसके साथ ही हर परिस्थिति में स्वाभिमान बनाए रखना, सही बात पर दृढ़ रहना और अनुचित समझौते न करने की सीख भी उन्हें पिता से ही मिली। पिता के निधन के बाद घोर आर्थिक संकट में भी उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया और दिन-रात अथक परिश्रम करके अपने पिता के गौरव को अक्षुण्ण रखा।
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