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  1. भौगोलिक दृष्टि से भारत के दो दक्षिणतम छोर माने जाते हैं: मुख्य भूमि का दक्षिणतम बिंदु: भारत के स्थल-भाग का अंतिम छोर तमिलनाडु राज्य का 'कन्याकुमारी' (केप कोमोरिन) ही है ()। संपूर्ण भारत संघ का दक्षिणतम बिंदु: भारतीय सीमा का सबसे अंतिम सुदूर दक्षिणतम सिरा 'इंदिरा पॉइंट' (Indira Point) है, जो ग्रेट निRead more

    भौगोलिक दृष्टि से भारत के दो दक्षिणतम छोर माने जाते हैं:

    मुख्य भूमि का दक्षिणतम बिंदु: भारत के स्थल-भाग का अंतिम छोर तमिलनाडु राज्य का ‘कन्याकुमारी’ (केप कोमोरिन) ही है ()।

    संपूर्ण भारत संघ का दक्षिणतम बिंदु: भारतीय सीमा का सबसे अंतिम सुदूर दक्षिणतम सिरा ‘इंदिरा पॉइंट’ (Indira Point) है, जो ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित है ()। इसे पूर्व में ‘पिग्मेलियन पॉइंट’ भी कहा जाता था। वर्ष 2004 में आई भयानक सुनामी के दौरान इसका एक बड़ा तटीय हिस्सा समुद्र में जलमग्न हो गया था।

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  2. जिस समय मोहन राकेश ने यात्रा की थी, उस समय वह केवल एक प्राकृतिक एकांत चट्टान थी जहाँ स्वामी विवेकानंद ने साधना की थी। बाद में एकनाथ रानाडे के प्रयासों से वर्ष 1970 में वहाँ भव्य 'विवेकानंद रॉक मेमोरियल' का निर्माण हुआ, जिसमें सभा मंडप और ध्यान मंडप बनाए गए। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2000 में स्मारक के समीRead more

    जिस समय मोहन राकेश ने यात्रा की थी, उस समय वह केवल एक प्राकृतिक एकांत चट्टान थी जहाँ स्वामी विवेकानंद ने साधना की थी। बाद में एकनाथ रानाडे के प्रयासों से वर्ष 1970 में वहाँ भव्य ‘विवेकानंद रॉक मेमोरियल’ का निर्माण हुआ, जिसमें सभा मंडप और ध्यान मंडप बनाए गए। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2000 में स्मारक के समीप ही स्थित दूसरी बड़ी चट्टान पर महान तमिल दार्शनिक एवं कवि संत तिरुवल्लुवर की 133 फुट ऊँची गगनचुंबी पाषाण प्रतिमा स्थापित की गई (जो उनके महाग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ के 133 अध्यायों का प्रतीक है)। वर्तमान में आधुनिक नौका सेवा (फेरी) द्वारा दोनों स्थलों को पर्यटन व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में जोड़ दिया गया है।

     

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    • 16
  3. स्थानीय कुंभकार (मूर्तिकार) से बातचीत पर आधारित प्रतिवेदन: शिल्प का नाम: मृत्तिका शिल्प (मिट्टी के बर्तन, दीपक व मूर्तियाँ)। कार्य अवधि व प्रशिक्षण: वे यह कार्य लगभग 25 वर्षों से कर रहे हैं। उन्होंने इसका व्यावहारिक हुनर अपने पूर्वजों और पिता से सीखा; कोई औपचारिक संस्थागत प्रशिक्षण नहीं लिया। महिलाओRead more

    स्थानीय कुंभकार (मूर्तिकार) से बातचीत पर आधारित प्रतिवेदन:

    शिल्प का नाम: मृत्तिका शिल्प (मिट्टी के बर्तन, दीपक व मूर्तियाँ)।

    कार्य अवधि व प्रशिक्षण: वे यह कार्य लगभग 25 वर्षों से कर रहे हैं। उन्होंने इसका व्यावहारिक हुनर अपने पूर्वजों और पिता से सीखा; कोई औपचारिक संस्थागत प्रशिक्षण नहीं लिया।

    महिलाओं की भूमिका: घर की महिलाएँ मिट्टी छानने, सुखाने, गूँथने, बर्तनों पर पारंपरिक चित्रकारी करने और उन्हें पकाने के लिए भट्ठी तैयार करने में बराबर की भागीदारी निभाती हैं।

    सामग्री, तकनीक व लागत: चिकनी मिट्टी, प्राकृतिक रंग और पारंपरिक चाक मुख्य साधन हैं। लागत कम होती है, किंतु शारीरिक श्रम अत्यधिक लगता है।

    विपणन: तैयार उत्पाद स्थानीय हाट-बाज़ार, मेलों और त्योहारों (जैसे दीपावली) में सीधे ग्राहकों को बेचे जाते हैं।

     

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    • 17
  4. पारंपरिक हस्तशिल्प और कारीगरों के संरक्षण हेतु सरकार अनेक ठोस योजनाएँ चला रही है: वित्तीय सहायता व प्रशिक्षण: 'पीएम विश्वकर्मा योजना' के अंतर्गत पारंपरिक कारीगरों को पहचान-पत्र, कौशल उन्नयन प्रशिक्षण, टूलकिट और कम ब्याज दर पर आसान ऋण दिया जा रहा है। बाज़ार की उपलब्धता: 'हुनर हाट' और 'सरस आजीविका मेलRead more

    पारंपरिक हस्तशिल्प और कारीगरों के संरक्षण हेतु सरकार अनेक ठोस योजनाएँ चला रही है:

    1. वित्तीय सहायता व प्रशिक्षण: ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ के अंतर्गत पारंपरिक कारीगरों को पहचान-पत्र, कौशल उन्नयन प्रशिक्षण, टूलकिट और कम ब्याज दर पर आसान ऋण दिया जा रहा है।
    2. बाज़ार की उपलब्धता: ‘हुनर हाट’ और ‘सरस आजीविका मेलों’ के आयोजन से कारीगरों को बड़े शहरों में सीधे उत्पाद बेचने का अवसर मिलता है।
    3. विशेष योजनाएँ: ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) योजना के तहत प्रत्येक जिले के विशेष हस्तशिल्प को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के रूप में पहचान दिलाई जा रही है, तथा ‘गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस’ (GeM) और खादी ग्रामोद्योग के माध्यम से सीधे सरकारी खरीद में भी इन्हें प्राथमिकता दी जाती है।

     

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    • 5
  5. विशेष आवश्यकता वाले साथियों (दिव्यांगजन) को यात्रा के दौरान निम्नलिखित गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है: आवागमन में बाधा: बस, ट्रेन या नौका में व्हीलचेयर ले जाने के लिए रैंप, लिफ्ट और चौड़े दरवाजों का अभाव रहता है। अनुकूल सुविधाओं की कमी: होटलों, पर्यटन स्थलों और रेलवे स्टेशनों पर दिव्यांग-अनुRead more

    विशेष आवश्यकता वाले साथियों (दिव्यांगजन) को यात्रा के दौरान निम्नलिखित गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है:

    आवागमन में बाधा: बस, ट्रेन या नौका में व्हीलचेयर ले जाने के लिए रैंप, लिफ्ट और चौड़े दरवाजों का अभाव रहता है।

    अनुकूल सुविधाओं की कमी: होटलों, पर्यटन स्थलों और रेलवे स्टेशनों पर दिव्यांग-अनुकूल शौचालयों व विश्राम कक्षों की भारी कमी होती है।

    सूचना का अभाव: दृष्टिबाधित साथियों के लिए ब्रेल लिपि या ऑडियो घोषणाओं तथा मूक-बधिर साथियों के लिए सांकेतिक भाषा (साइन लैंग्वेज) गाइड उपलब्ध नहीं होते।

    सुरक्षा व संवेदनहीनता: भीड़भाड़ में दुर्घटना का भय और समाज में सहानुभूति के स्थान पर संवेदनशीलता की कमी उन्हें मानसिक रूप से असहज करती है।

     

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