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भारतीय ज्ञान साहित्य में अनेक स्थानों पर नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में संतुलन की बात की गई है। इस विषय पर अपने शिक्षक के साथ मिलकर चर्चा कीजिए।
भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता समन्वय और संतुलन है। हमारे वेदों, उपनिषदों और गीता में स्पष्ट कहा गया है कि जीवन केवल उपभोग के लिए नहीं, बल्कि साधना के लिए है। 'योगः कर्मसु कौशलम्' का अर्थ है कि अपने कार्यों को कुशलता और नैतिकता के साथ करना ही योग है। नैतिकता हमें सही और गलत का बोध कराती है,Read more
भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता समन्वय और संतुलन है। हमारे वेदों, उपनिषदों और गीता में स्पष्ट कहा गया है कि जीवन केवल उपभोग के लिए नहीं, बल्कि साधना के लिए है। ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ का अर्थ है कि अपने कार्यों को कुशलता और नैतिकता के साथ करना ही योग है।
नैतिकता हमें सही और गलत का बोध कराती है, जिससे समाज में व्यवस्था बनी रहती है। अध्यात्म हमें आंतरिक शांति और धैर्य प्रदान करता है, जो आज के तनावपूर्ण जीवन में अत्यंत आवश्यक है। वहीं, व्यावहारिक ज्ञान हमें संसार में सफलता प्राप्त करने और अपनी आजीविका चलाने में सक्षम बनाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, जो व्यक्ति अति भोग और अति त्याग के बीच ‘मध्यम मार्ग’ अपनाता है, वही सुखी रहता है। जिस प्रकार एक पक्षी को उड़ने के लिए दो पंखों की आवश्यकता होती है, वैसे ही मनुष्य को उन्नति के लिए भौतिक प्रगति (व्यावहारिक) और मानसिक पवित्रता (आध्यात्मिक) दोनों का संतुलन चाहिए। शिक्षक के साथ इस चर्चा का निष्कर्ष यही है कि मूल्यों के बिना सफलता अधूरी है और कर्म के बिना ज्ञान व्यर्थ है।
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एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 क्या लिखूँ? समाधान – प्रश्न उत्तर, कठिन शब्द-उत्तर, सारांश तथा अभ्यास के सभी प्रश्नों के हल – सत्र 2026-27 के अनुसार संशोधित रूप में यहाँ दिए गए हैं।
https://hindi.tiwariacademy.com/ncert-solutions/class-9/hindi/ganga-chapter-2/
See less‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ एक लोकोक्ति है। लोक में प्रचलित लोकप्रिय वाक्य या वाक्यांश को लोकोक्ति कहते हैं, जो किसी विशेष अर्थ या सीख को व्यक्त करता है। लोकोक्ति भाषा को समृद्ध करती है तथा विचारों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में सहायता करती है। यह लोगों के अनुभव, विश्वास और मूल्यों को दर्शाती है। आपने यह लोकोक्ति भी सुनी होगी- ‘आम के आम गुठलियों के दाम’। अब आप इस लोकोक्ति और ‘जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास’ विषय को मिलाकर एक संक्षिप्त लेख तैयार कीजिए।
'आम के आम गुठलियों के दाम' लोकोक्ति का अर्थ है दोहरा लाभ प्राप्त करना। जब हम अपने घर के बगीचे या विद्यालय में 'जैविक खाद' बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। सामान्यतः हम फल-सब्जियों के छिलकों और सूखे पत्तों को कचरा समझकर फेंक देते हैं, लेकिन जब हम इनका उपयोग खाद बनाने में कRead more
‘आम के आम गुठलियों के दाम’ लोकोक्ति का अर्थ है दोहरा लाभ प्राप्त करना। जब हम अपने घर के बगीचे या विद्यालय में ‘जैविक खाद’ बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। सामान्यतः हम फल-सब्जियों के छिलकों और सूखे पत्तों को कचरा समझकर फेंक देते हैं, लेकिन जब हम इनका उपयोग खाद बनाने में करते हैं, तो हम कचरे का सदुपयोग कर उसे अनमोल संसाधन में बदल देते हैं।
इससे एक ओर तो पर्यावरण की स्वच्छता बनी रहती है और दूसरी ओर हमें रसायनों से मुक्त, शुद्ध जैविक खाद प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया में हमारा कोई अतिरिक्त व्यय नहीं होता, बल्कि घर के व्यर्थ सामान से ही पौधों के लिए ‘काला सोना’ तैयार हो जाता है। अतः कचरे का प्रबंधन और खाद की प्राप्ति वास्तव में दोहरा लाभ देने वाला एक सराहनीय प्रयास है।
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एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 क्या लिखूँ? समाधान – प्रश्न उत्तर, कठिन शब्द-उत्तर, सारांश तथा अभ्यास के सभी प्रश्नों के हल – सत्र 2026-27 के अनुसार संशोधित रूप में यहाँ दिए गए हैं।
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See less“जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।” आपने पढ़ा कि ढोल के पास बैठे व्यक्ति की अपेक्षा दूर बैठे व्यक्ति के लिए ढोल की आवाज़ का अनुभव भिन्न है। अपने अनुभव के आधार पर किसी ऐसी घटना का उल्लेख अपनी डायरी में कीजिए, जब किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था के विषय में दूर से आपका अनुमान कुछ और रहा हो, पर निकट से आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा हो।
प्रिय डायरी, आज मुझे 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' वाली बात का विपरीत अनुभव हुआ। पहले मुझे लगता था कि हमारे शहर का नया बड़ा अस्पताल केवल एक सुंदर इमारत है जहाँ बहुत भीड़ और शोर होगा। बाहर से उसकी भव्यता और कांच की दीवारें मुझे बहुत ठंडी और औपचारिक लगती थीं। मेरा अनुमान था कि वहाँ के डॉक्टर और कर्मचारRead more
प्रिय डायरी, आज मुझे ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ वाली बात का विपरीत अनुभव हुआ। पहले मुझे लगता था कि हमारे शहर का नया बड़ा अस्पताल केवल एक सुंदर इमारत है जहाँ बहुत भीड़ और शोर होगा। बाहर से उसकी भव्यता और कांच की दीवारें मुझे बहुत ठंडी और औपचारिक लगती थीं। मेरा अनुमान था कि वहाँ के डॉक्टर और कर्मचारी भी मशीन की तरह रूखे होंगे।
परंतु, जब पिछले सप्ताह मुझे अपनी छोटी बहन के इलाज के लिए वहाँ जाना पड़ा, तो मेरा अनुभव बिल्कुल बदल गया। निकट से देखने पर पाया कि वहाँ की व्यवस्था अत्यंत मानवीय और प्रेमपूर्ण थी। डॉक्टरों का व्यवहार और नर्सों की आत्मीयता ने मुझे सुरक्षा का अहसास कराया। वह स्थान केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि सेवा और करुणा का केंद्र था। वास्तव में, बिना निकट जाए हम किसी भी सत्य को पूर्णतः नहीं समझ सकते।
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एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 क्या लिखूँ? समाधान – प्रश्न उत्तर, कठिन शब्द-उत्तर, सारांश तथा अभ्यास के सभी प्रश्नों के हल – सत्र 2026-27 के अनुसार संशोधित रूप में यहाँ दिए गए हैं।
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See less‘आदर्श निबंध’ और ‘व्यक्तिगत निबंध’ के बीच के द्वंद्व को लेखक ने किस प्रकार स्पष्ट किया है?
लेखक ने निबंध लेखन की दो धाराओं के बीच के अंतर को बहुत बारीकी से समझाया है। एक ओर निबंधशास्त्र के आचार्य हैं जो मानते हैं कि एक अच्छे निबंध के लिए विषय का गहन ज्ञान, सामग्री का क्रमबद्ध संकलन और प्रभावशाली भाषा अनिवार्य है। यह एक शास्त्रीय और अनुशासित तरीका है। दूसरी ओर, मानटेन जैसी शैली है जहाँ नियRead more
लेखक ने निबंध लेखन की दो धाराओं के बीच के अंतर को बहुत बारीकी से समझाया है। एक ओर निबंधशास्त्र के आचार्य हैं जो मानते हैं कि एक अच्छे निबंध के लिए विषय का गहन ज्ञान, सामग्री का क्रमबद्ध संकलन और प्रभावशाली भाषा अनिवार्य है। यह एक शास्त्रीय और अनुशासित तरीका है। दूसरी ओर, मानटेन जैसी शैली है जहाँ नियम गौण हो जाते हैं और लेखक का अपना व्यक्तित्व प्रधान हो जाता है। लेखक का मानना है कि वास्तविक निबंध वही है जिसमें औपचारिकता के बजाय आत्मिक सुख और मानसिक स्फूर्ति हो। आदर्श निबंध जहाँ मस्तिष्क की कसरत है, वहीं व्यक्तिगत निबंध हृदय का उल्लास है। इन दोनों शैलियों का समन्वय ही निबंध लेखन की असली चुनौती है।
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एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 क्या लिखूँ? समाधान – प्रश्न उत्तर, कठिन शब्द-उत्तर, सारांश तथा अभ्यास के सभी प्रश्नों के हल – सत्र 2026-27 के अनुसार संशोधित रूप में यहाँ दिए गए हैं।
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See less“वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है” – लेखक के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
लेखक का मानना है कि समाज कभी भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं हो सकता। विकास की प्रक्रिया में पुरानी परंपराएं समय के साथ अप्रासंगिक हो जाती हैं और नए सामाजिक दोष जन्म ले लेते हैं। जो विचार कल तक 'सुधार' माने जाते थे, वे आज की परिस्थितियों में 'दोष' बन सकते हैं। इसलिए, समाज को बेहतर बनाने की प्रक्रिया कभी रुRead more
लेखक का मानना है कि समाज कभी भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं हो सकता। विकास की प्रक्रिया में पुरानी परंपराएं समय के साथ अप्रासंगिक हो जाती हैं और नए सामाजिक दोष जन्म ले लेते हैं। जो विचार कल तक ‘सुधार’ माने जाते थे, वे आज की परिस्थितियों में ‘दोष’ बन सकते हैं। इसलिए, समाज को बेहतर बनाने की प्रक्रिया कभी रुकती नहीं है। हर नई पीढ़ी अपने समय की समस्याओं को देखती है और उन्हें सुधारने का प्रयास करती है। इसीलिए लेखक कहते हैं कि सुधारों का कोई अंत नहीं है; यह एक निरंतर चलने वाला चक्र है जहाँ वर्तमान हमेशा खुद को सुधारने और नए आदर्श स्थापित करने में व्यस्त रहता है।
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