Virat
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लेखक ने ‘दूर के ढोल सुहावने’ लोकोक्ति के माध्यम से मानवीय मनोविज्ञान के किस सत्य को उजागर किया है?

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लेखक ने बताया है कि मनुष्य अक्सर यथार्थ की कमियों के कारण वर्तमान से दुखी रहता है और जो वस्तु पहुँच से दूर होती है, उसकी कठिनाइयों को अनदेखा कर उसे सुंदर समझता है।

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  1. लेखक के अनुसार, ‘दूर के ढोल सुहावने’ केवल एक कहावत नहीं बल्कि मानव मन की एक गहरी प्रवृत्ति है। जब हम किसी वस्तु के निकट होते हैं, तो उसकी कमियां और कर्कशता हमें परेशान करती है, जैसे ढोल के पास बैठे व्यक्ति को उसका शोर सुनाई देता है। लेकिन दूर बैठे व्यक्ति को केवल उसकी गूँज और मधुरता का अनुभव होता है। इसी तरह, हम अपने वर्तमान की समस्याओं से इतने घिरे होते हैं कि हमें अपना अतीत या भविष्य अधिक सुखद लगता है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि दूरी दोषों को छिपा देती है और केवल सुंदरता को उभारती है, जिससे मनुष्य हमेशा उस सुख की कामना करता है जो उसके पास वर्तमान में उपलब्ध नहीं है।

     

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