मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। सच्ची मित्रता में औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। हँसी-मजाक और हल्की खींचतान संबंधों को और अधिक जीवंत, सहज और अटूट विश्वास से परिपूर्ण बनाती है।
“दोस्ती में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता।” क्या आप इस बात से सहमत हैं? आपको ऐसा क्यों लगता है? अपने अनुभवों के आधार पर बताइए।
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कक्षा 9 की हिंदी की नई पाठ्यपुस्तक ‘गंगा’ का प्रथम अध्याय ‘दो बैलों की कथा’ है, जिसे मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है। इस अध्याय में उन्होंने प्रेम, मित्रता, संघर्ष और मानवीय संवेदना को बहुत अच्छे से प्रस्तुत किया है । मित्रता में जब तक संकोच बना रहता है, तब तक वह रिश्ता केवल शिष्टाचार तक सीमित रहता है। जब हम अपने मित्रों के साथ बिना किसी डर के मजाक करते हैं या थोड़ी नोंक-झोंक करते हैं, तो इससे आपसी समझ और गहराई बढ़ती है। जैसे हीरा और मोती एक-दूसरे को सींग मारते थे, वह लड़ाई नहीं बल्कि प्रेम का प्रदर्शन था। मेरे अपने अनुभव में भी, जिन मित्रों के साथ मेरा व्यवहार एकदम बेबाक और अनौपचारिक है, उन्हीं पर मैं सबसे अधिक विश्वास करता हूँ। यह ‘धौल-धप्पा’ उस दीवार को गिरा देता है जो दो व्यक्तियों के बीच कृत्रिम दूरियाँ बनाए रखती है।
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