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“ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्टू ‘राम राम सीताराम’ की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा।” क्या कभी ऐसा हुआ कि आपने सोचा कुछ और, हुआ कुछ और? उस अनुभव को लिखिए।
जीवन में अक्सर ऐसा होता है कि हमारी योजनाएँ यथार्थ से बिल्कुल अलग निकलती हैं। पिछले साल मैंने एक प्रतियोगिता के लिए कड़ी मेहनत की थी और मुझे पूरा विश्वास था कि मैं प्रथम आऊँगा। लेकिन, ऐन वक्त पर मेरी तबीयत खराब हो गई और मैं भाग ही नहीं ले पाया। मैंने सफलता सोची थी, पर मुझे असफलता और बीमारी मिली। उसRead more
जीवन में अक्सर ऐसा होता है कि हमारी योजनाएँ यथार्थ से बिल्कुल अलग निकलती हैं। पिछले साल मैंने एक प्रतियोगिता के लिए कड़ी मेहनत की थी और मुझे पूरा विश्वास था कि मैं प्रथम आऊँगा। लेकिन, ऐन वक्त पर मेरी तबीयत खराब हो गई और मैं भाग ही नहीं ले पाया। मैंने सफलता सोची थी, पर मुझे असफलता और बीमारी मिली। उस अनुभव ने मुझे सिखाया कि जीवन अनिश्चितताओं से भरा है और हमें हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।
For more NCERT Solutions of Class 9 Hindi Ganga Chapter 3 संवादहीन Question Answer (2026-27)
एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 3 संवादहीन समाधान – प्रश्न उत्तर, कठिन शब्दों के अर्थ, व्याकरण तथा सारांश – सत्र 2026-27 के लिए विद्यार्थी यहाँ से निशुल्क प्राप्त कर सकते हैं।
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See less“मिट्टू अब पिंजरे में रहने के इतने आदी हो चुके थे कि उन्होंने बाहर आने की कोई इच्छा नहीं प्रकट की।” क्या प्राणी सचमुच पिंजरे में रहने के आदी हो सकते हैं? अपने उत्तर के समर्थन में अपने आस-पास से उदाहरण भी दीजिए।
प्राणी शारीरिक और मानसिक रूप से पिंजरे के आदी हो जाते हैं क्योंकि वे सुरक्षा और भोजन के लिए मनुष्य पर निर्भर हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, हमारे पड़ोस में एक तोता कई सालों से पिंजरे में है। जब एक बार पिंजरा खुला रह गया, तो वह बाहर जाकर फिर वापस अंदर आ गया। वह खुले आसमान में जाने से डर रहा था। यह दरRead more
प्राणी शारीरिक और मानसिक रूप से पिंजरे के आदी हो जाते हैं क्योंकि वे सुरक्षा और भोजन के लिए मनुष्य पर निर्भर हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, हमारे पड़ोस में एक तोता कई सालों से पिंजरे में है। जब एक बार पिंजरा खुला रह गया, तो वह बाहर जाकर फिर वापस अंदर आ गया। वह खुले आसमान में जाने से डर रहा था। यह दर्शाता है कि परतंत्रता की आदत जीव की मौलिक स्वतंत्रता की प्यास को धीरे-धीरे खत्म कर देती है।
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See less“अंत में जगन मास्टर की घरवाली ने उनकी चिंता दूर कर दी।” कहानी में रेखांकित पात्र का नाम नहीं दिया गया है। इसे कहीं ‘मास्टराइन’, तो कहीं ‘जगन मास्टर की घरवाली’ कहा गया है। आपके अनुसार कहानी में ऐसा क्यों किया गया होगा?
कहानी में जगन मास्टर की पत्नी को नाम न देना समाज में व्याप्त पुरुष-प्रधान मानसिकता और पारंपरिक संबोधन शैली को रेखांकित करता है। गाँव में आज भी महिलाओं को स्वयं की पहचान के बजाय उनके परिवार या पति के पद (जैसे मास्टराइन) से पहचाना जाता है। लेखक ने 'जगन मास्टर की घरवाली' जैसे शब्दों का प्रयोग करके आंचलRead more
कहानी में जगन मास्टर की पत्नी को नाम न देना समाज में व्याप्त पुरुष-प्रधान मानसिकता और पारंपरिक संबोधन शैली को रेखांकित करता है। गाँव में आज भी महिलाओं को स्वयं की पहचान के बजाय उनके परिवार या पति के पद (जैसे मास्टराइन) से पहचाना जाता है। लेखक ने ‘जगन मास्टर की घरवाली’ जैसे शब्दों का प्रयोग करके आंचलिकता का पुट दिया है, जो यह दर्शाता है कि उस परिवेश में व्यक्तिगत नाम से अधिक सामाजिक भूमिका और संबंध महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
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See lessमान लीजिए कि ताई आपके मोहल्ले में रहती हैं। वे कुंभ-स्नान के लिए कैसे गई होंगी? उनकी यात्रा का वर्णन लिखिए। (संकेत- कहाँ से कहाँ तक की यात्रा, टिकट, यात्रा के साधन, संगी-साथी, खान-पान, ठहरना आदि।)
ताई ने अपने मोहल्ले के बुजुर्गों की मंडली के साथ प्रयागराज तक की लंबी रेल यात्रा तय की होगी। सूती झोले में सत्तू और अचार लेकर वे भक्ति गीतों के बीच स्टेशन पहुँची होंगी। संगम तट पर तंबू या किसी कच्ची धर्मशाला में ठहरकर उन्होंने कड़कड़ाती ठंड में पवित्र स्नान किया होगा। यात्रा के दौरान अपनों का साथ औरRead more
ताई ने अपने मोहल्ले के बुजुर्गों की मंडली के साथ प्रयागराज तक की लंबी रेल यात्रा तय की होगी। सूती झोले में सत्तू और अचार लेकर वे भक्ति गीतों के बीच स्टेशन पहुँची होंगी। संगम तट पर तंबू या किसी कच्ची धर्मशाला में ठहरकर उन्होंने कड़कड़ाती ठंड में पवित्र स्नान किया होगा। यात्रा के दौरान अपनों का साथ और तीर्थ का उत्साह उनकी थकान मिटा देता है, जहाँ संवादहीनता के बजाय केवल ‘जय गंगे’ का शोर गूँजता है।
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See lessआपके गाँव या नगर में कौन-सा मेला, उत्सव या पर्व मनाया जाता है? वहाँ का दृश्य, भीड़, श्रद्धा और वातावरण का वर्णन कीजिए। मेले में कैसी आवाजें, रंग, गंध, खान-पान, दृश्य और भाव होंगे? (संकेत- उनका वर्णन पाँच ज्ञानेंद्रियों – देखने, सुनने, सूँघने, छूने और स्वाद महसूस करने के आधार पर कीजिए।)
मेले का दृश्य रंग-बिरंगी लाइटों और झूलों से जगमगाता है। कानों में पीं-पीं की आवाज़ें और भजनों का शोर गूँजता है, जबकि नाक में तलते हुए मालपुओं और ताजी मिट्ठी की गंध भर जाती है। हाथों से रेशमी चूड़ियाँ छूना और ठंडी कुल्फी का स्वाद लेना एक जादुई अनुभव होता है। लोगों की भीड़ के बीच पसीने और अगरबत्ती कीRead more
मेले का दृश्य रंग-बिरंगी लाइटों और झूलों से जगमगाता है। कानों में पीं-पीं की आवाज़ें और भजनों का शोर गूँजता है, जबकि नाक में तलते हुए मालपुओं और ताजी मिट्ठी की गंध भर जाती है। हाथों से रेशमी चूड़ियाँ छूना और ठंडी कुल्फी का स्वाद लेना एक जादुई अनुभव होता है। लोगों की भीड़ के बीच पसीने और अगरबत्ती की मिली-जुली महक के साथ अपार श्रद्धा का भाव हर व्यक्ति के चेहरे पर साफ झलकता है।
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