Virat
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“वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है” – लेखक के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

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इस कथन का आशय है कि समाज में परिवर्तन निरंतर होते रहते हैं, जिससे नए दोष पैदा होते हैं। इन दोषों को मिटाने के लिए हर युग में नए सुधारों की आवश्यकता बनी रहती है।

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  1. लेखक का मानना है कि समाज कभी भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं हो सकता। विकास की प्रक्रिया में पुरानी परंपराएं समय के साथ अप्रासंगिक हो जाती हैं और नए सामाजिक दोष जन्म ले लेते हैं। जो विचार कल तक ‘सुधार’ माने जाते थे, वे आज की परिस्थितियों में ‘दोष’ बन सकते हैं। इसलिए, समाज को बेहतर बनाने की प्रक्रिया कभी रुकती नहीं है। हर नई पीढ़ी अपने समय की समस्याओं को देखती है और उन्हें सुधारने का प्रयास करती है। इसीलिए लेखक कहते हैं कि सुधारों का कोई अंत नहीं है; यह एक निरंतर चलने वाला चक्र है जहाँ वर्तमान हमेशा खुद को सुधारने और नए आदर्श स्थापित करने में व्यस्त रहता है।

     

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