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  1. बगुला समाज के ढोंगी लोगों का प्रतीक है, जो दिखावा कुछ करते हैं और उनका आचरण कुछ और ही होता है। इसलिए कहावत भी है- बगुला भगत ! कविता में भी ढोंगी बगुला धयान लगाकर खड़ा है, किंतु मछली को देखते ही उसे झट पकड़ कर, चट गटक जाता है। चिडि़या के ‘चतुर’ विशेषण पर गौर कीजिए, यह कुछ चालाक लोगों की ओर संकेत करतीRead more

    बगुला समाज के ढोंगी लोगों का प्रतीक है, जो दिखावा कुछ करते हैं और उनका आचरण कुछ और ही होता है। इसलिए कहावत भी है- बगुला भगत ! कविता में भी ढोंगी बगुला धयान लगाकर खड़ा है, किंतु मछली को देखते ही उसे झट पकड़ कर, चट गटक जाता है। चिडि़या के ‘चतुर’ विशेषण पर गौर कीजिए, यह कुछ चालाक लोगों की ओर संकेत करती है। चालाक चिडि़या, मछली को झपट कर उठा लेती है। प्रकृति के ये दृश्य भी समाज के व्यवहार की ओर संकेत करते हैं। समाज में कुछ कपटी, चालाक और धूर्त लोग दूसरों का शोषण करते हैं, किंतु इनकी अधिकता नहीं है। विशेष बात तो यह है कि प्रकृति का प्यार भरा रूप अधिक आकर्षक है।

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  2. साँझ होने को आई है और तालाब की सतह पर चाँद का प्रतिबिंब चमक रहा है। उसकी चमक आँखों को चैंधिाया देती है। चाँद के बारे में कवि की कल्पना देखिए-‘एक चाँदी का बड़ा-सा गोल खंभा’। चाँद के लिए चाँदी का बड़ा-सा, गोल खंभा कहना ठीक है, परंतु क्या आप बता सकते हैं कि चाँद कवि को खंभा क्यों प्रतीत हुआ? जी, हाँ !Read more

    साँझ होने को आई है और तालाब की सतह पर चाँद का प्रतिबिंब चमक रहा है। उसकी चमक आँखों को चैंधिाया देती है। चाँद के बारे में कवि की कल्पना देखिए-‘एक चाँदी का बड़ा-सा गोल खंभा’। चाँद के लिए चाँदी का बड़ा-सा, गोल खंभा कहना ठीक है, परंतु क्या आप बता सकते हैं कि चाँद कवि को खंभा क्यों प्रतीत हुआ? जी, हाँ ! किसी तालाब या पोखर के हिलते जल में चाँद का प्रतिबिंब उसकी गहराई का भी बोधा कराता है जबकि शांत जल में वह एक गोला-सा ही लगता। लहरों वाले तालाब में किरणों के फिसलने से उसमें लंबाई प्रतीत होती है। इसलिए कवि को लगता हैµ‘चाँदी का बड़ा-सा गोल खंभा।’ µइसे ही कहते हैं कवि की सूक्ष्म दृष्टि और कल्पना।

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  3. प्रकृति का अनुराग भरा आँचल हिल रहा है! यह दृश्य कवि के मन को छू लेता है। उसे लगता है इस ग्रामीण अंचल में किसी नगर की अपेक्षा अधिक प्यार भरा वातावरण है। नगर तो व्यावसायिक हो गए हैं। व्यावसायिक नगरों में प्यार कम उपजता है। ग्रामीण अंचल की भूमि प्रेम-प्यार के लिए अधिाक उपजाऊ है। जैसे कि इस निर्जन अंचलRead more

    प्रकृति का अनुराग भरा आँचल हिल रहा है! यह दृश्य कवि के मन को छू लेता है। उसे लगता है इस ग्रामीण अंचल में किसी नगर की अपेक्षा अधिक प्यार भरा वातावरण है। नगर तो व्यावसायिक हो गए हैं। व्यावसायिक नगरों में प्यार कम उपजता है। ग्रामीण अंचल की भूमि प्रेम-प्यार के लिए अधिाक उपजाऊ है। जैसे कि इस निर्जन अंचल में भी प्रकृति के चप्पे-चप्पे में प्यार दिखाई पड़ रहा है।

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  4. कवि कहता है-‘और सरसों की न पूछो !’ सरसों अब सयानी हो गई है। ‘सयानी होना’ के तीन अर्थ हैं- एक तो समझदार होना, दूसरा यौवन पा लेना और तीसरा चतुर होना। यहाँ सरसों के विषय में उसे सयानी कह कर कवि ने युवती होने की ओर संकेत किया है और बताया है कि वह विवाह-योग्य हो गई है इसीलिए उसने अपने हाथ पीले कर लिए हैंRead more

    कवि कहता है-‘और सरसों की न पूछो !’ सरसों अब सयानी हो गई है। ‘सयानी होना’ के तीन अर्थ हैं- एक तो समझदार होना, दूसरा यौवन पा लेना और तीसरा चतुर होना। यहाँ सरसों के विषय में उसे सयानी कह कर कवि ने युवती होने की ओर संकेत किया है और बताया है कि वह विवाह-योग्य हो गई है इसीलिए उसने अपने हाथ पीले कर लिए हैं। हाथ पीले करना’ एक मुहावरा है, जिसका अर्थ शादी कर लेना है। कवि ने सरसों के प्रसंग में ही ‘हाथ पीले करना’ का प्रयोग क्यों किया? क्योंकि सरसों जब फूलती है तो पूरा खेत ही पीला हो जाता है। तो पीली सरसों ब्याह के मंडप में पधाार चुकी है।

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  5. चने के पौधो का आकार छोटा होता है। चने में गुलाबी रंग के फूल आ गए हैं। कवि को लगता है, यह छोटे-से कद का, बित्ते भर का चना अपने सिर पर गुलाबी पाग (पगड़ी) बाँधो, सजे-सँवरे दूल्हे-सा खड़ा है।

    चने के पौधो का आकार छोटा होता है। चने में गुलाबी रंग के फूल आ गए हैं। कवि को लगता है, यह छोटे-से कद का, बित्ते भर का चना अपने सिर पर गुलाबी पाग (पगड़ी) बाँधो, सजे-सँवरे दूल्हे-सा खड़ा है।

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